जब महिषासुर नामक एक भैंसा-असुर ने स्वर्ग पर कब्जा कर हाहाकार मचा दिया और सारे देवता बेबस हो गए, तब ब्रह्मांड का इतिहास बदलने वाली शक्ति का जन्म हुआ। उस अजय असुर को हराने के लिए ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने अपना तेज मिलाया। और इसी असीम ऊर्जा से देवी दुर्गा का भव्य प्राकट्य हुआ। असुर का अंत करने के लिए सभी देवताओं ने उन्हें अपने सबसे मारक आयुध सौंपे। भगवान शिव ने उन्हें अपना त्रिशूल प्रदान किया। भगवान विष्णु ने अजय सुदर्शन चक्र और शंख अर्पित किया। काल देव ने उन्हें चमचमाता हुआ खड्ग दिया और पर्वतराज हिमालय ने सवारी के लिए यह शक्तिशाली सिंह भेंट किया। देवी दुर्गा कोई साधारण देवी नहीं, बल्कि सभी देवों के अस्त्रों से सुसज्जित एक परम महाशक्ति हैं। इसी अजय रूप में उन्होंने महिषासुर का वध किया और अधर्म का अंत कर दिया, जिससे सृष्टि में दोबारा शांति और प्राकृतिक संतुलन स्थापित हो गया। इसलिए आज मनाई जाने वाली दुर्गा पूजा मात्र कोई साधारण धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह उसी असुर के वध और धरती पर पुनः लौटी हरियाली के उल्लास का महापर्व है।